हसरते नादानी में ,
यूँ सब कुछ लुटा बैठे,
जो कभी सोचा न था,
ऐसा भी कुछ कर बैठे ,
जो न था मंजूर ,
मुक़द्दर को ,
उसकी सजा भी,
भुगत बैठे ,
ढूंढ़ा था बड़ी मुश्किल से,
साथी राह ए मंजिल का,
उसको भी हम,
बीच राह में ही गवां बैठे ,
जो हसरत थी दिल में,
उसके लिये अपनी दुनिया लुटा बैठे ,
चलना था साथ तेरे ,
तेरा ही विश्वास लुटा बैठे,
क्या बात है वाह वाह वाह ...बहोत खुब
ReplyDeleteसुंदर भाव
ReplyDeleteबेहतरीन रचना
बधाई
आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी पधारें भी सम्मलित हों
केक्ट्स में तभी तो खिलेंगे--------
बहुत खुबसूरत रचना !!
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ReplyDelete.........बहुत सुंदर !
पहली बार आपके ब्लॉग को पढ़ा मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है
राज चौहान
http://rajkumarchuhan.blogspot.in
हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में इस नये ब्लॉग का और आपका मैं संजय भास्कर हार्दिक स्वागत करता हूँ.
ReplyDeleteहिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
ReplyDeleteकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें
बहुत भी सुंदर भाव अभिव्यक्त हुये इस रचना, बहुत शुभकामनाएं.
ReplyDeleteरामराम.
बहुत ही सुंदर
ReplyDeleteयहाँ भी पधारे
गुरु को समर्पित
http://shoryamalik.blogspot.in/2013/07/blog-post_22.html
बहुत सुन्दर....
ReplyDeleteइस नादानी पे किसी का बस नहीं होता ...
ReplyDeleteस्वागत है आपका ब्लॉग जगत में ..
क्या करें आखिर हसरतें वेवकूफ जो होती हैं...सार्थक प्रस्तुति।
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