हसरते नादानी में ,
यूँ सब कुछ लुटा बैठे,
जो कभी सोचा न था,
ऐसा भी कुछ कर बैठे ,
जो न था मंजूर ,
मुक़द्दर को ,
उसकी सजा भी,
भुगत बैठे ,
ढूंढ़ा था बड़ी मुश्किल से,
साथी राह ए मंजिल का,
उसको भी हम,
बीच राह में ही गवां बैठे ,
जो हसरत थी दिल में,
उसके लिये अपनी दुनिया लुटा बैठे ,
चलना था साथ तेरे ,
तेरा ही विश्वास लुटा बैठे,